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मंगलवार, 16 मई 2017

आखिर ‘किसने’ और ‘क्यों’ बदली बालपन की परिभाषा

फतेहपुर, शमशाद खान । कहते हैं कि बचपन सबसे अच्छा होता है। इस पन को खेलने-खाने के लिए जाना जाता है। बड़े काम के बोझ तले जब भी खुद को दबे पाते हैं तो अतीत की यादों में खो जाते हैं, इसलिहाज से समाज में बालपन को मौजमस्ती से जोड़कर देखा जा रहा है। किंतु जो ताजी परिस्थितियां उभकर सामने आ रही हैं वह इस मिथक को लगातार झुठलाती चली जा रही हैं। नजरे उठाने भर की जरूरत है, ऐसी तस्वीरें देखने को मिल जाएंगी। जो यह कहने को पर्याप्त होंगी किस इस पन में भी अब काम का बोझ है। खास यह है कि वह बोझ ही नही बल्कि ऐसा सामाजिक अभिशाप है जो उन तमाम व्यवस्थाओं व कार्यक्रमों के करारा तमाचा जड़ने का काम कर रहा है, जिनके जरिए बाल श्रम को जड़ से मिटाने के शासन-प्रशासन व समाज के अलम्बदारों द्वारा जब तब दावे किए जा रहे हैं। बाल श्रम सामाजिक अभिशाप बन चुका है। यह धीरे-धीरे ऐसा रूप लेता जा रहा है जो आगे आने वाले दिनों में नासूर बन जाएगा। बच्चे ही हमारे कल के तारणहार है। इन पर ही राष्ट्र का भविष्य है, इस लिहाज से पढ़ाई की उम्र में इनके द्वारा काम किया जाना वह भी ऐसा-वैसा नही बल्कि मन को झकझोरने वाला यकीनन समाज को आइना दिखाने भर को काफी है। जिले में बाल श्रमिकों की तादात का कोई आंकलन नही किया जा सकता है। क्योंकि हर गली-कूचे में इनका बालपन पसीना बहाने को मजबूर है। ऐसा नही है कि इनके दिलों में भी पढ़ने-लिखने की ख्वाहिश न हो, लेकिन समय की मार से यह घुट-घुटकर मरने को मजबूर हैं, इसके लिए किसी की पारिवारिक स्थितियां जिम्मेदार हैं तो किसी के सामने वह सारी व्यवस्थाएं दोषी हैं जो बालश्रम मिटाने के लिए बनाई गई हैं और अभी तक कारगर नही हो सकी है। होटल, ढाबों में पिसता बचपन अब लोगों को ज्यादा नही झकझोरता लेकिन कूड़े के ढेरों व नाला-नालियों में जीविका तलाशने के लिए बढ़ते इनके हांथ जरूर नजरें उठाने वालेां केा न सिर्फ ठिठकने पर मजबूर कर देते हैं बल्कि दिल से एक आह भी निकलती है। शहर हो या गांव ऐसे नजारें अब आम हो चले हैं। विडम्बना इस बात की है कि इन नजारों को समाप्त करने के लिए अभी तक कोई ऐसी कारगर योजना नही बन सकी है जो बाल पन को उसका वास्तविक पन दिलाने में सक्षम हो। जिला मुख्यालय में सैकड़ों मासूम कंधे में स्कूली बैग के बजाए जीविका तलाशने वाला झोला टांग कर घूमने को विवश हैं। प्रशासन के आला अधिकारी, स्वयंसेवी संस्थाएं सहित समाज का जन प्रतिनिधित्व करने वाले हमारे नेतागण इनकी बेबसी से आखिर क्यों मुंह चुरा रहे हैं, यह बात खासी चैंकाने वाली है। आखिर कब इनके लिए यह सब आगे आएंगे और इनको समाज की मुख्य धारा से जोड़ने की पहल करेंगे। श्रमायुक्त विभाग के अधिकारी ने कई मर्तबे दावे किए कि वह और उनकी टीम बाल श्रमिकों को सही राह दिखाने के लिए लगी हुई है। देखा जाए तो पूरा काम इतना कठिन नही है कि इसे पूरा न किया जा सके। फिर तो इसमें लापरवाही बरती जा रही है या फिर इच्छाशक्ति ही नही दिखाई जा रही, जिससे समाज की सबसे बड़ी इस कुरीति को समाप्त किया जा सके। अकेले दुकानों में काम करने वाले मासूमों की धरपकड़ करने भर से ही काम नही चलने वाला। इसके लिए इस टीम को कूड़े के ढेर भी झांकने होंगे। इसमें जो अपना बालपन खपा रहे हैं उनकी पीड़ा सुननी होगी। अगर ऐसा नही हुआ तो जो अभियान चल रहा है या चलने का दावा किया जा रहा है। वह कभी सफल नही होगा। काम के बोझ तले पसीना बहा रहे मासूमों के परिजनों केा भी यह समझना होगा कि वह इनसे काम न लें, इनको स्कूल भेंजे ताकि आगे चलकर यह तुम्हारे सपनों को साकार कर सकें, लेकिन फिर एक बार कहना उचित होगा क्या वास्तव में ऐसी पहल होगी या फिर हर साल की तरह बाल दिवस के मौके पर लम्बी-लम्बी डींगे हांककर कर्तव्यो व दायित्वो की इतिश्री कर ली जाएगी।

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