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मंगलवार, 26 जून 2018

अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो

पँखुरी पाठक 

आज फिर दिल डूब रहा है .. संस्कृति का चेहरा देखती हूँ तो रागिनी और श्रेया का चेहरा ध्यान आता है, उनके परिवार वालों की चीख़ें याद आती है .. निर्भया के साथ हुई बर्बरता की ख़बर सुनने पर खड़े उठे रोंगटे याद आते हैं ..

कुछ नहीं बदला , बस हम सुन्न पड़ गए हैं , आदत पड़ गयी है हमें , अब फ़र्क़ नहीं पड़ता, किसी को भी नहीं , बहुत बार मुझे भी नहीं जब रोज़ ये ख़बर पड़ती हूँ और फिर दूसरी पर चली जाती हूँ । आज लेकिन शायद संस्कृति की तस्वीर देख कर कुछ जाग उठा । तस्वीर में माथे के बीच बस गोली का निशान नहीं था , एक बुझी हुई ज़िंदगी की कहानी नहीं थी लेकिन सदियों की सभ्यता पर लगा वो काला धब्बा , समाज पर लगा वो कालिख.. जैसे मुझे उलटा घूर रहा था , मानो कह रहा हो कि देखो , कितना बेबस कर दिया है मैंने तुम्हें.. देखो इस तस्वीर को , क्यूँकि तुम सब बस देख सकते हो.. बस देख सकते हो और कुछ नहीं । ऐसा लगा जैसे किसी ने तमाचा मार दिया हो । जितनी बार तस्वीर को देखती हूँ साँस रुकने सी लगती है ।

निर्भया ने क्यूँ हमें झिंझोड़कर रख दिया था ? क्यूँकि निर्भया हमारी आस थी , प्रतीक थी नए भारत का , जहाँ बेटियाँ अपनी क़िस्मत ख़ुद लिखती हैं । लेकिन उस उम्मीद , उस आस को कुचल कर रख दिया गया था.. जैसे कोई अतीत का श्राप हो जो हम भूल गए थे और वो हमें उस दिन याद दिलाया गया हो । हमारा भ्रम तोड़ा गया था । हमें याद दिलाया गया था कि हमें कुचलना कितना आसान है । कोई भी मर्द पैरों तले सालों की माँ बाप की मेहनत को रौंदता हुआ निकल सकता है । एहसास कराया गया था बेटियों के माँ बाप को कि वह कितनी असमर्थ हैं , कितनी कमज़ोर , कितने अपाहिज ..

कितने साल बीत गए , कितनी और निर्भया कुचल दी गयी , क्या बदला ? हम और आप बदल गए । हमें आदत पड़ गयी। हम ख़बर देखते हैं , सुनते हैं और सुकून से सो जाते हैं। अब किसी की चीख़ें हमारे कानों तक नहीं पहुँचती ।

बेटियों के माँ बाप अपनी नाकाम कोशिशों में लगे हैं.. जैसे संस्कृति के माँ बाप ने कोशिश की थी .. बेटी को पढ़ाने की , इंजीनियर बनने की .. बलिया से लखनऊ भेजा .. जो सपना उसने देखा वही सपना उन्होंने देखा । लेकिन क्या हुआ ? कुछ आदमियों ने तय कर लिया कि सपने देखने का हक़ संस्कृति को नहीं मिला था । जीने का हक़ भी उसका नहीं था ।आख़िर इस नए भारत में एक बेटी ने इतनी हिम्मत कैसे कर ली ?

आप सोचेंगे कि मैं ज़्यादा भावुक हो गयी हूँ , ज़्यादा नकारात्मक हो रही हूँ , परिस्थितियाँ इतनी भी ख़राब नहीं । आपने शायद बेटी के मौत के बाद का सन्नाटा नहीं देखा । मैंने देखा है । लगता है घर की हर दीवार चिल्ला रही हो .. क्यूँ पैदा किया !! क्यूँ पढ़ाया !! क्यूँ सपने दिखाए !! क्यूँ नहीं मार डाला जैसे बाक़ी सब मार रहे थे ?? पैदा होते ही , पैदा होने से पहले ?

माँ बाप दादी बाबा की खोखली आँखों में बिटिया की तस्वीर ग़ायब हो रही होती है , कभी नन्ही परी दिखती है , कभी जैसा उसे आख़िरी बार देखा था .. गुनाह कहीं उनका ही तो नहीं था ? घर से निकलने ही नहीं दिया होता तो ? पैदा ही नहीं किया होता तो ?

और कहीं ये सब देखती वो निर्भया , रागिनी , आसिफ़ा , संस्कृति .. क्या वापस बिटिया जनम वो माँगेगी ?

मैं तो नहीं माँगूँगी ।

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( लेखिका पँखुरी पाठक समाजवादी पार्टी की प्रवक्ता हैं )

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