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मंगलवार, 26 जून 2018

मादक पदार्थ निषेध दिवस महज दिखावा

कानपुर नगर, हरिओम गुप्ता -  अंतर्राष्ट्रीय नशा व मादक पदार्थ निषेध दिवस प्रत्येक वर्ष 26 जून को समूचे विश्व में मनाया जाता है, इस वर्ष भी यह मनाया गया।नशीली चीजों और पदार्थो के निवारण हेतु संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 7 दिसबंर 1987 को प्रस्ताव पारित कर हर वर्ष 26 जून को अंतराष्ट्रीय नशा व मादक पदार्थ निषेध दिवस मनाने का निर्णय लिया था। इसकाउददेश्य लोगो में नशे के विरोध में जागरूक करना था तो वही दूसरी ओर नशे के लती लोगों के उपचार की दिशा में कार्यकरना था लेकिन आज ऐसा कुछ भी नही हो रहा है। शहर में कुछ नशामुक्ति केंद्र इस प्रथा को जीवित किये है लेकिन धनाभाव की कमी के कारण उन्हे भी कठिनाईयों का सामना करना पड रहा है। हमारे बीच नशे के विभिन्न रूप बढते जा रहे है और प्रतिदिन लोग ही नही बच्चे भी इसकी गिरफ्त में आ रहे है। हम बात करते है बच्चों की जो इस समय ज्यादा नशे की गिरफ्त में आते जा रहे है।
         भले ही 26 जून को अतंर्राष्ट्रीय नशा व मादक पदार्थ निषेध दिवस  है लेकिन सच यह है कि कानपुर सहित पूरे देश में लोग जिस प्रकार नशे की लत में फंसते जा रहे है उससे निषेध दिवस का मायने नही रह जाता। देश की सरकारों द्वारा आज तक नशे को रोकने के लिए कोई ठोस नणनीति नही बनी। यदि कानपुर की ही बात की जाये तो यह देश का प्रसिद्ध शहर है और उ0प्र0 सरकार को अधिक से अधिक राज्सव देता है। यहां आईआईटी, मेडिकल काॅलेज, उच्च शिक्षा और कारखाने है लेकिन यहां पर नशे की जडे भी गहरी है और कहा जा सकता है कि जवान, पुरूष, महिलाओं के साथ बच्चे तक किसी न किसी नशे की लत का शिकर है। वर्तमान में बच्चो द्वारा व्हाइटनर, सुलेशन, मादक पदार्थो का सेवन किया जा रहा है। यह सफेद मोत व्हाइटनर जो पेपर पर राइटिंग मिस्टेक को मिटाने के नाम पर बिता है वहीं सुलेशन जोडने वाला एक पदार्थ है। एक विशलेषण के अनुसार 12 से 18 वर्ष तक के मासूम बच्चे इस नशे की गिरफ्त में आ रहे है और प्रतिदिन बच्चों की संख्या बढती जा रही है। पहले इन पदार्थो की गिरफ्त में मलिन व छोटी बस्तियो या फुटपाथ, सडकों के किनारे रहने वालो के बच्चे आते थे लेकिन अब इस सफेद मौत व्हाइटनर व सुलेशन ने अपनी पकड स्कूली बच्चों पर बनाना शुरू कर दिया है। यह नश सरलता से स्टेशनरी व हार्डवेयर की दुकानों में सस्ते दामों में उपलब्ध हो जाता है, जिसे बच्चे रूमाल या कपडे में लगाकर नाक अथवा मुंह से सूंधते व खींचते है और उन्हे नशा महसूस होता है। यही नही कई मासूम कानपुर की सडकों पर मादक पदार्थो का सेवन करते भी दिखायी पड जायेगे। इस सफेद नशे के चंगुली से बचाने के लिए न तो शासन-प्रशासन और न ही समाजिक संगठन आगे आते है लेकिन मासूम जरूर इस नशे की गिरफ्त में आते जा रहें है।

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