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मंगलवार, 26 जून 2018

ज्येष्ठ के सभी 9 बड़े मंगल पर समाजवादी पार्टी ने आयोजित किया विशाल भण्डारा

सनातन - समाजवाद और संविधान :  कुंठा और विद्वेष के मुकाबिल 

अरविन्द विद्रोही 

" अनवरत जिम्मेदारों ने किया प्रसाद वितरण "  

#मंगलनामा ।।  सनातन धर्म,उसके प्रतीक, उसके पर्व ,उसके रीति रिवाज हमारे अपने हैं । हर एक पर्व, मंगल
उत्सव से करोड़ करोड़ आम जन की आस्था और विश्वास जुड़ा है । सनातन धर्मी जन जन की भावनाएं-विश्वास इन तमाम तीज त्यौहारों से जुड़ी हैं ।इन पर प्रहार ,इन पर कुठाराघात करने से कुछ भी सार्थक हासिल नही होगा । सनातन और संविधान दोनों में समाजवाद समाहित है । हम लोकतांत्रिक देश के निवासी हैं ।हमारा संविधान हमें समता-सम्पन्नता-बराबरी- नागरिक अधिकार और कर्तव्यों की शिक्षा देता है ,यही शिक्षा हमारा संवैधानिक अधिकार भी है । सनातन, समाजवाद और संविधान भेद भाव ,विद्वेष की कतई अनुमति-अधिकार नही देता है । अधिकार के साथ साथ जन जन को कर्तव्य निर्वाहन के लिए कार्य करने की दिशा में अग्रसर होने के लिए प्रेरित करने के लिए तमाम उदाहरण हमारे पुरखों-महापुरुषों ने अपने संघर्षमय जीवन से प्रस्तुत किये हैं । 

समाज में आपसी सौहार्द ,आपसी प्रेम ,आपसी समझ को बनाये रखने के लिए तमाम स्तर पर अनगिनत मनीषियों ने कार्य किये हैं और कर भी रहे हैं । साथ ही साथ दुःखद पहलू यह भी है कि विद्वेष,घृणा, वैमनस्यता के प्रचारक भी सक्रिय रहते हैं ।यह आम जन की ही ताकत है कि ये विद्वेष,घृणा,वैमनस्यता के प्रचारक अधिकतर  नेपथ्य में ही रहते ,यदा कदा इनकी ताकत में विभिन्न कारणों से इजाफा होता इनका प्रभाव दिखता परन्तु फिर ये आम जन की आंतरिक शक्ति -समझ के कारण हार जाते । आम समाज इनको नकारता और ये समाज के विभिन्न जाति के मध्य कटुता बोने और उसकी लहलहाती फसल काटने के सपने देखते ही रह जाते हैं । अफसोसजनक यह भी है कि जातीय विद्वेष के ये वाहक सनातन धर्म-मूल्यों-परम्पराओं के विरुद्ध अनर्गल मिथ्या प्रलाप करते रहते हैं । इनका पूरा का पूरा जीवन सिर्फ और सिर्फ जातीय विद्वेष-घृणा-कुंठा से उपजी हीन भावना को भोगते भोगते ही व्यतीत हो जाता है । सामाजिक-जातीय-धार्मिक-राष्ट्रीय चेतना और जनजागरण के महती आवश्यक कार्य को करने की जगह इन लोगों ने अपनी नफरत और पाखंड के व्यापार को जीवन का लक्ष्य बना लिया । ठीक भी है सभी के अपने अपने जीवन के लक्ष्य होते हैं उन लक्ष्यों की पूर्ति के लिए उनको कार्य करना भी चाहिए परन्तु जब किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह-संस्था के कार्य -गतिविधियाँ जातीय विद्वेष ,धार्मिक घृणा उत्पन्न करने वाली हों,  उनकी वाणी और कार्यशैली समाज - देेेशहित के विपरीत हो तो मौन रहना अनुचित ही कहलाता है । #मंगलनामा

लोकतंत्र में लोक अर्थात जनता का ही महत्व होता है । राजनैतिक संगठनों और राजनेताओं का लक्ष्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत जनविश्वास हासिल करके सत्ता हासिल करना ,सत्ता में भागीदारी करना ,सत्ता न मिलने पर विपक्ष की जिम्मेदार भूमिका का निर्वाहन करते हुए जनपक्ष को दृढ़ता से रखना होता है । सत्ता पक्ष को जहाँ अपने कार्यों से अपने समर्थकों-कार्यकर्ताओं - आम जनों की उम्मीदों पर खरा उतरना होता है वही दूसरी तरफ विपक्ष को आम जन की समस्याओं को कारगर तरीके से उठाना होता ,अपने कार्यकर्ताओं को जनसंघर्ष के लिए तैयार करना रहता ,समर्थकों की संख्या में कैसे बढोत्तरी हो और आम जन का पुनः विश्वास अर्जन कार्य कैसे पूरा हो यह मनन,चिंतन और व्यवहार में अनुपालन करना रहता है । #मंगलनामा

उप्र में असंख्य विकास कार्यो को 2012 से 2017 तक के कार्यकाल में करने वाले-आधारशिला रखने वाले सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव 2017 के विधानसभा चुनाव के पूर्व घटित दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम का राजनैतिक खामियाजा भुगत चुके हैं ।सच तो यह है कि सिर्फ अखिलेश यादव ही नही तमाम समाजवादी सहित असंख्य जन भी अपने को असहज ही महसूस करते हैं । विपक्ष में आने के बाद उप्र के उपचुनावों में सपा नेतृत्व ने समझदारी पूर्ण निर्णय लिए और जनविश्वास को हासिल किया । यह जनविश्वास सरकारों के प्रति उपजे असंतोष की परिणति के साथ साथ सभी जातियों-वर्गों के एक साथ सपा गठबंधन प्रत्याशियों के पक्ष में आने से ही सम्भव हुआ । जातीय-धार्मिक विद्वेष की नकारने के साथ साथ आम जन ने उपचुनावों में  सत्ताधारी भाजपा को आगाह भी कर दिया । उपचुनावों में विपक्ष की जीत को जातीय जकड़न में समेटने का एक दुष्प्रचार भी सार्वजनिक पटल पर पढ़ने को मिलता है । इसको नकारते हुए  सपा के ही एक वरिष्ठ नेता के शब्दों में -- "अखिलेश यादव सभी जाति-धर्म-वर्ग की बात करने वाले ईमानदार नौजवान नेता हैं । उनकी ईमानदारी ,मेहनत और हर जाति-वर्ग के प्रति सम्मान के प्रति किसी को भी तनिक सन्देह नही होना चाहिए । " #मंगलनामा

अधिकतर लोग जानते हैं कि सार्वजनिक पटल पर -सोशल मीडिया पर सवर्णों विशेषकर ब्राह्मणों पर कुछ व्यक्ति -व्यक्तियों का समूह अनवरत हमलावर है । समाजवाद के नाम पर जातीय विद्वेष फैलाना इनका खुला ध्येय है ।जरूर इनको इस कार्य से लाभ हो रहा है तभी ये इस कार्य को करते हैं ।मेरा यह मानना है कि  समाजवादी पार्टी के प्रति समर्पित सवर्णों विशेषकर ब्राह्मणों को किसी भी तरह से सपा से पृथक करने की किसी गुप्त रणनीति योजना के तहत यह जातीय विद्वेष-घृणा का अभियान निरन्तर चलाया जा रहा है । यही नही सपा के वरिष्ठतम नेता राजेन्द्र चौधरी और एस आर एस यादव सरीखे नेता भी इनके निशाने पर हैं ।  ध्यान से समझने पर इनका अघोषित एजेंडा समझ मे आता है कि हर उस शख्स को ,हर उस व्यक्ति को सपा से ,हर उस सवर्ण को ,हर उस ब्राह्मण को अखिलेश यादव से पृथक कर दो जो अपनी पहचान रखता हो - जिसकी योग्यता -पकड़ का लाभ सपा और अखिलेश यादव को मिल रहा हो या मिल चुका हो , मिलने की संभावना हो  । अखिलेश यादव के द्वारा ही दायित्व पाए अनगिनत लोग इनके निशाने पर रहते हैं । लिखना मजबूरी और जरूरी है कि जो खुद परजीवी हैं ,जिनके आचरण से व्यवहार से पाखंड प्रत्यक्ष दिखता है ,जिनकी खुद की इतनी भी योग्यता नही कि वे अपनी जाति-बिरादरी का मत अपने मनमुताबिक किसी दल को दिला सकें वे समाजवादी पार्टी के समर्पित-निष्ठावान ,अपने जीवन के अनमोल वर्ष समाजवादी आन्दोलन पार्टी को दे चुके वरिष्ठों से लेकर सवर्ण परिवार में जन्में पक्के समाजवादी चरित्र एवं मन के लोगों पर प्रश्न चिन्ह लगाते फिरते हैं । 85 वर्ष की आयु के वयोवृद्ध एसआरएस यादव को उप्र के हर जनपद की हर विधानसभा का एक एक आंकड़ा और एक एक पुराना -नया जमीनी कार्यकर्ता पता है ।वे बोलते कम हैं क्योंकि उनको कार्य करना रहता है  और उनके कार्य के अंतर्गत संगठन की गतिविधियों सम्बंधित जितने कार्य होते है वे बखूबी करते हैं ।यही वजह है कि नेता जी के बाद अखिलेश यादव भी उन पर विश्वास करते हैं और उनको इस उम्र में भी दायित्व सौंपे हैं । वे कम बोलते हैं लोगों से , सोशल मीडिया का उपयोग नही करते क्योंकि उनको वे दायित्व पूरे करने होते जो उनको सपा नेतृत्व सौंपती है । अपनी अपनी जानकारी में यह सभी वृद्धि कर लें कि वरिष्ठ समाजवादी एसआरएस यादव हों या राजेन्द्र चौधरी समाजवादी पार्टी के निर्देश के बगैर ये लोग एक भी राजनैतिक निर्णय नही लेते ,निर्देश या प्रेस विज्ञप्ति जारी नही करते हैं । इसी प्रकार सपा के फ्रंटल के तमाम अध्यक्ष हों या एमएलसी गण -- सभी के सभी सिर्फ और सिर्फ समाजवादी पार्टी के नेतृत्व यानि कि अखिलेश यादव राष्ट्रीय अध्यक्ष के ही दिशा निर्देश पर कार्य करते हैं । #मंगलनामा

समाजवादी पार्टी अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाज को जोड़ने के प्रयास में लग गई है । उसी कड़ी में एक सार्थक सराहनीय धार्मिक जनकार्य भण्डारे का आयोजन भी है । अखिलेश यादव अपने गृह प्रवेश पर पूजा हवन भी करते ,नित्य नियम से ध्यान ,पूजन और व्यायाम भी । यही  तो सनातन जीवन शैली है । सनातन धर्म विरोधी  उनकी छवि बनाने का कार्य सपा विरोधी दलों के साथ साथ बहुत ही तेजी से उपचुनावों में सपा गठबंधन की जीत के बाद जातीय विद्वेष-कुंठा युक्त  एक गिरोह कर रहा है,पहले भी करता था अब बहुत तेजी पकड़ ली है । तमाम समाजवादी साथी इनके घृणा युक्त अभियान से दुःखी हुए ,समाजवादियों ने वाजिब प्रतिरोध भी दर्ज किया ,लिखा भी ,अपना पक्ष - अपनी पीड़ा को भी सार्वजनिक तौर पर  बयाँ किया । जातीय घृणा और विद्वेष के ही कारण बहुत से अच्छे सच्चे समाजवादी मनमसोस कर शांत होकर घर बैठ गए हैं ,कुछ एक ने अपनी पीड़ा को सार्वजनिक करते हुए इनको चुनौती भी दी । ये लोग वो कार्य कर रहे जिसकी अनुमति सनातन - समाजवाद और संविधान कोई नही देता है । #मंगलनामा

आज अंत में सिर्फ इतना कि ये जातीय विद्वेष-घृणा के प्रचारक-पैरोकार सिर्फ और सिर्फ समाज,समाजवाद और समाजवादी पार्टी का अनवरत नुकसान ही कर रहे । पता करिये तो पता चल जाएगा कि परप्रांतियों का गिरोह किससे किससे लाभ लेकर उप्र में समाजवादी पार्टी को नुकसान पहुंचाने के मिशन के तहत वर्षों पहले एक परजीवी को यहाँ भेज चुका था जो परजीवी -परप्रांतीय -पाखण्डी यहाँ ऐशयुक्त जीवन व्यतीत कर रहा है । #मंगलनामा


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