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गुरुवार, 5 जुलाई 2018

मोदी सरकार को मुद्दों पर घेरने में विफल विपक्ष

अरविन्द विद्रोही 


कुख्यात आर्थिक अपराधी नीरव मोदी को भारत से फरार हुए कितने दिन हो गए ? क्या विपक्षी दल इसे मुद्दा बनाकर जनता के बीच नही ले जा सकते ? नीरव मोदी के फरार होने के महीनों बाद  भारत का विदेश मंत्रालय इंटरपोल से रेड कॉर्नर नोटिस जारी करवाता है इस देरी की वजह विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से क्यों नही पूछता है विपक्ष ? 

आखिर कार विपक्ष जनता के बीच कुख्यात अपराधियों के प्रत्यर्पण न होने के प्रश्न को क्यों नही ले जाता ? विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की जवाबदेही क्यों नही तय की जा रही है ? जाकिर नाईक ,विजय माल्या, ललित मोदी सहित तमाम कुख्यात अपराधियों को भारत क्यों नही ला सकी हैं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ? क्या यह सच नही है कि ललित मोदी की वकील सुषमा स्वराज की पुत्री रही हैं ,फिर भी विपक्ष की अजब गजब खामोशी । 

तमाम मुद्दों में यह एक प्रमुख मुद्दा है जिससे देश के आम जनमानस को समझाया बताया जा सकता था कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण मंत्रालयों में से एक विदेश मंत्रालय की गैरजिम्मेदारी,लापरवाही किस कदर है ? लेकिन वातानुकूलित कमरों में प्रेस वार्ता,टीवी डिबेट में सिमट चुके विपक्ष को गाँव-गरीब-खेत-खलिहान और आम जन के बीच जाकर उनको तथ्यों से अवगत कराने की जरूरत समझ ही नही आई । इन विपक्ष के नेताओं को कौन समझायेगा कि भाषण,टीवी डिबेट और प्रेस वार्ता में भाजपा के नेताओं-प्रवक्ताओं के सामने बिल्कुल भी नही टिकते हो ।अपने तर्को-तथ्यों और वाक्य पटुता से भाजपा प्रवक्ता गण हावी और प्रभावी हो जाते जो भी आम जन टीवी डिबेट देखते वो अंत मे कोसते ही हैं विपक्षी दल के प्रवक्ताओं को । 

उप्र के बनारस में फ्लाईओवर हादसा के जिम्मेदार के विरुद्ध विपक्षी दल खासकर समाजवादी पार्टी आंदोलित क्यों नही हैं? वो कौन सी निर्माण कम्पनी है जिसको उस फ्लाईओवर का निर्माण कार्य आवंटित हुआ था ? क्या जनहित के मुद्दों पर सार्थक-अनवरत विरोध का संकल्प-माद्दा भी नही हैं विपक्षी दलों के नेतृत्व के पास ?? सच तो यही है कि विभिन्न जन समस्याओं पर जनता या राजनैतिक कार्यकर्ता यदा कदा स्वतः मुखरित हो रहे लेकिन विपक्षी राजनैतिक दल और उनका नेतृत्व पूर्णतया संकल्पित-समर्पित-सांगठनिक-सैद्धान्तिक संघर्ष से कोसों दूर सिर्फ खाना पूरी युक्त बयानबाजी -प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही खुद को संतुष्ट करता रहता है । 

आखिर क्या मजबूरी है इस खामोशी की ?? जिन मुद्दों पर भाजपा सरकार जनता के बीच घिरी नजर आती उन मुद्दों पर विपक्षी दलों की यह अनोखी चुप्पी क्यों ?  क्या दलों के गठबंधन से सत्ता हासिल करना ही एकमात्र लक्ष्य और मार्ग है अब ? काला धन , महंगाई , बलात्कार,कानून व्यवस्था , आय से अधिक संपत्ति , रोजगारी,प्रत्यर्पण जैसे तमाम जनहित के मुद्दों पर संघर्ष और आंदोलन का मार्ग क्यों विस्मृत कर दिया विपक्षी दलों समेत समाजवादी पार्टी नेतृत्व ने ?? क्या ये विपक्षी दल यह तक विस्मृत कर चुके कि इन्ही मुद्दों को जोर शोर से टीवी डिबेट,भाषणों से लेकर जन जन के बीच चर्चा करके मुद्दा बनाकर ही भाजपा की मोदी सरकार का गठन हुआ था । अब अगर इन तमाम मुद्दों पर विपक्ष जनता के बीच अपने संगठन के दम पर आंदोलन-जनसंघर्ष खड़ा करे तो भाजपा -मोदी सरकार तो जन अदालत में घिरेगी ही लेकिन जाने क्यों विपक्ष सिर्फ जबानी खाना पूरी ही करता आ रहा है ।

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