AMJA BHARAT एक वेब न्‍यूज चैनल है जिसे कम्‍प्‍यूटर, लैपटाप, इन्‍टरनेट टीवी, मोबाइल फोन, टैबलेट इत्‍यादी पर देखा जा सकता है। पर्यावरण सुरक्षा के लिये कागज़ बचायें, समाचार वेब मीडिया पर पढें

शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2018

कूष्मांडा (माँ का चौथा रूप )

माँ का चौथा रूप कूष्मांडा का है । 'कू' का अर्थ छोटा, 'ऊष्म' का अर्थ ऊर्जा, अंडा का अर्थ गोलाकार है । अर्थात् कूष्मांडा का शाब्दिक अर्थ हुआ - 'छोटा और गोलाकार ऊर्जा पिंड' ।

 यह  हमारी हृदयस्थ  स्थिति का प्रतीक है और देखें तो 'पिंड से ब्रह्मांड बनता है' का भी प्रतीक है । माना भी जाता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति करने के कारण माता का नाम कूष्मांडा पड़ा है : "कुत्सित: ऊष्मा  त्रिविधतापयुतः संसार: , स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्या:  सा कूष्मांडा ।" 

 साधारण शब्दों में  त्रिविध-ताप-युक्त संसार जिनके अंदर स्थित है, वे भगवती कूष्मांडा कहलाती हैं।  अर्थात्, ब्रह्मांड की उत्पत्ति करने के कारण ये कुष्मांडा हैं  ।  तो, इस दिन पिंड से ब्रह्मांड की यात्रा के लिए कूष्मांडा देवी की विशेष साधना की जाती है । 

यहाँ साधक अपनी साधना के बीच में है, पुल पर है । इसमें साधक का ध्यान हृदय तत्त्व (अनाहत चक्र) पर है, जिसका मूल तत्व अग्नि है ।

माँ कूष्मांडा की उपासना का मंत्र-
"- कूष्मांडा: ऐं ह्री देव्यै नम:
वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्विनीम्॥"

आराधना के लिए माना जाता है कि चतुर्थी के दिन मालपुए का नैवेद्य अर्पित किया जाए और फिर उसे योग्य ब्राह्मण को दे दिया जाए. ऐसा करने से इसे अपूर्व दान मान  हर प्रकार के  विघ्न के दूर हो जाने की मान्यता भी है।

आपका ही,
कमल

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Advertisement

Advertisement

लोकप्रिय पोस्ट