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सोमवार, 15 अक्तूबर 2018

महाकाली (माता का सातवाँ रूप )

चराचर विश्व की अधीश्वरी, जगत् को धारण करनेवाली, संसार का पालन और संहार करने वाली तथा तेज:स्वरूप भगवान विष्णु की अनुपम शक्ति पराम्बा का सातवाँ रूप  'कालरात्रि' या 'महाकाली' का है ।  

 कालरात्रि का शाब्दिक अर्थ है -  'जो सब को मारने वाले काल की भी रात्रि या विनाशिका हो' ।  कालरात्रि को रूप  में भयंकरा, साधक के लिए अभयंकारा और भक्तों के लिए शुभंकरी कहा गया है, क्योंकि यह  समस्त शुभों की आश्रयस्थली हैं ।

 मान्यता है इस दिन तक आते-आते साधक की साधना मूलाधार से सहस्रार तक पहुँच जाती है । परमसत्ता इसी चक्र में अवस्थित होती है;  इसीलिए यह आदिम ऊर्जा ही  उद्दाम ऊर्जा या असीम ऊर्जा का स्पंदन कराती है।   

सांकेतिक  रूप से इसे माँ के  उग्र स्वरूप में निरूपित किया गया  ताकि इन सप्त चक्रों की सुषुप्त ऊर्जा जब उद्घाटित हो तो इस सृष्टि के कण-कण में अपरिमित ऊर्जा का प्रवाह हो ।

जगन्मयी माता की महिमा को ग्रंथों में कुछ इन विभूषणों से व्याख्यायित किया गया है :  आरम्भ में सृष्टिरूपा ,  पालन-काल में स्थितिरूपा , कल्पान्त के समय संहाररूपा,  महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोहरूपा, महादेवी ,महासुरी  और तीनों गुणों को उत्पन्न करनेवाली सबकी प्रकृति ।

इसके अलावा, महामाया को भयंकरा, कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी कहा गया तो  श्री,  ईश्वरी,  ह्री और  बोधस्वरूपा बुद्धि भी कहा गया । 

शक्ति की देवी कालिका (जो शस्त्र के रूप खड्ग धारण करती हैं ) की साधना हेतु मंत्र :
ॐ क्रीं कालिकायै नमः ।
ॐ कपालिन्यै नमः ।।

आपका ही,
कमल

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