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बुधवार, 10 अक्तूबर 2018

उच्च न्यायालक के आदेश के परिपेक्ष्य ने किसी विभाग द्वारा न हो कार्यवाही

कानपुर नगर, हरिओम गुप्ता -  शाहिद हलीम पुत्र स्व0 एसएम बशीर के हक में आयी सम्पत्तियों को शत्रु सम्पत्ति घोषित करने वाला आदेश जिलाधिकारी, अभिरक्षक शत्रु सम्पत्ति द्वारा पारित आदेश को उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्ड पीठ द्वारा स्थगित स्टे कर दिया गया और उपरोक्त स्टे यथावत जारी होने के पिरपेक्ष्य में समस्त कार्यवाही, आदेश शून्य व निष्प्रभावी के सम्बन्ध में जिलाधिकारी को एक ज्ञापन सौंपा गया।
                ज्ञापन के मायम से बताया गया कि अभिरक्षक शत्रु सम्पत्ति द्वारा पारित आदेश 18/5/2001 के द्वारा धोषित सभी सम्पत्तियो के अपनी मृत्यु उपरान्त भारत के सम्मानित नागरिक के रूप में रहे एवं हिन्दुस्तान व पाकिस्तान के विभाजन के बाद वो भारत के नागरिक के रूप में अपनी सभी सम्पत्यिों के स्वामी बने रहे। शाहिद हलीम जो एसएम बशी के पुत्र थे उनका भी जन्म भारत भूमि पर हुआ और वह यहां के नागरिक के रूप में रहे। बशीर साहब जब भारत विभाजन के दौरान 1947 में अक्टूबर 1949 के बची पाकिस्तान प्रवजन करके नही गये न ही उनकी कोई सम्पत्ति इण्डियन कस्टोडियन एक्टा 1950 के तहत किसी भी कस्टोडियन में निहित नही हुई, क्योंकि वो भारत के नागरिक भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद भी रहे। उनपर व उनकी सम्पत्ति पर यह एक्ट लागू नही हाता है और न ही शत्रु प्रापर्टी एक्ट 1968 उन पर लागू होता है। तथा शत्रु सम्पत्ति एक्ट 1968 में आये संशोधन अधिनियम 2017 के प्राविधान उनकी सम्पत्ति पर लागू नही होते है। कहा कहा इस परिपेक्ष्य को न देखते हुए जिलाधिकारी/अभिरक्षक शत्रु सम्पत्ति ने कैसर जहां व उनके सहयोगी सफीउल्ला गाजी ने भ्रमित करते हुए सही तथ्यों की जानकारी न देकर गलत आदेश बिना दूसरे पक्ष को सुने पारित करवा दिया था।, जबकि उक्त आदेश के बारे में जिलाधिकारी को अवगत कराया गया तो उन्होेने अपने पूर्व आदेश के निरस्त करवा दिया था। कहा शाहिद हलीम कभी भी शत्रु देश के नागरिक नही रहे। उपरोक्त् आदेश को अवैधानिक करार देने तथा कस्टोडियन जनरल इवैक्यू प्रापर्टी उ0प्र0 लखनऊ द्वारा पारित आदेश पुनः कन्फर्मेशन करने के बादे में आदेश को निरसत कर उच्च न्यायालय इलाहाबद की लखनऊ में एक रिट याचिका गुलाम मोईनुददीन आदि बनाम बोर्ड आफ रेवेन्यू आदि दाखिल की गयी, जिसमें उक्त आदेश को स्थगित कर स्टे कर दिया गया जो आज दिन तक प्रभावी है। कहा यदि उपरोक्त आदेश के परिपेक्ष्य में यदि किसी विभाग द्वारा कोई भी कार्यवाही या कोई आदेश पारित किया जायेगा तो वह शून्य व निष्प्रभावी होगा और उच्च न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आयेगा। 

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