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रविवार, 13 जनवरी 2019

धूमधाम से मनाया गया गुरू गोविन्द सिंह का 352 वां प्रकाश पर्व

फतेहपुर, शमशाद खान । गुरूद्वारा श्री गुरू सिंह सभा के तत्वाधान में रविवार को शहर के रेल बाजार मुहल्ला स्थित गुरूद्वारे में गुरू गोविन्द सिंह का 352 वां प्रकाश पर्व धूमधाम से मनाया गया। शबद, कीर्तन में बड़ी संख्या में सिक्ख समुदाय के लोगों ने शिरकत की। तत्पश्चात गुरूद्वारा परिसर में विशाल लंगर का आयोजन किया गया। जिसमें श्रद्धालुओं ने पंक्ति में बैठकर लंगर का प्रसाद छका। ग्रन्थी गुरूवचन सिंह ने बताया कि गुरू गोविन्द सिंह जी ने सत्य की खातिर युद्ध लड़े थे। ''ना कोउ बैरी ना ही बेगाना, सगल संग हम कउ बन आई।''
गुरूद्वारा में सुबह से ही शबद कीर्तन का आयोजन किया गया। जिसमें बड़ी संख्या में सिक्ख समुदाय के लोगों ने शिरकत की। शबद कीर्तन के दौरान गुरूद्वारे के ग्रन्थी ज्ञानी गुरूवचन सिंह ने बताया कि सिक्खों के दसवें गुरू महान योद्धा, संत सिपाही तथा सरवंशदानी श्री गुरू गोविन्द सिंह का जन्म 22 दिसम्बर सन 1666 ई0 में बिहार के पटना शहर में हुआ था। उनके पिताश्री गुरू तेग बहादुर जी के ज्योति-ज्योत समाने के बाद 11 नवम्बर 1675 ई0 को वे गुरू गद्दी पर विराजमान हुए। उन्होने सन 1699 ई0 में बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना की। इन्हीं की कृपा के सजे हुए हैं। धर्म, मानवता व भारतवर्ष के लिए उन्होने अपने समस्त परिवार का बलिदान दिया। जिस कारण इन्हें सरवंशदानी भी कहा जाता है। इन्होेने की सिक्खों के पवित्र ग्रन्थ श्री गुरू साहिब का सम्पादन कर उसे पूर्ण रूप से गुरू की उपाधि प्रदान कर उसके सिक्खों के ग्यारहवें गुरू के स्थान पर स्थापित कर भी को इनके आदर्शों पर चलने का संदेश दिया। वे भक्ति व शक्ति का अद्वितीय संगम थे। वे अपनी वाणी में संदेश देते हैं ''भै काहू को देत नहि, नहि भय मानत आन।'' उनका मानना था कि मनुष्य को किसी को डराना भी नहीं चाहिए और न ही किसी से डरना चाहिए। उन्होने अपने पिता जी की तरह ही मुगल शासक औरंगजेब से कश्मीरी हिन्दुओं की सुरक्षा की। उन्होने अपनी सेना को सिंह का नाम दिया। श्री गुरू गोविन्द जी अपने साथ बाज को रखते थ। क्योंकि बाज कभी किसी का गुलाम नहीं हो सकता। वे एक ऐसे संत सिपाही थे जिन्हें धर्म, मानवता या भारतवर्ष के लिए कुछ भी कुर्बान करना पड़े उससे कभी पीछे नहीं हटते थे। उनका एक मात्र सहारा था अकाल पुरख। ''ना कोउ बैरी ना ही बेगाना, सगल संग हम कउ बन आई।'' गुरू जी ने अपने जीवन में जितने भी युद्ध लड़े वे सभी जीते और सभी युद्ध सत्य की खातिर लड़े। ''देह शिवा वर मोहे इहैं, शुभ करमन ते कबहूं न टरो।'' कीर्तन के बाद गुरूद्वारे में ही विशाल लंगर का आयोजन किया गया। जिसमें सिक्ख समुदाय के अलावा अन्य लोगों ने भी बड़ी संख्या में शिरकत की। सभी को पंक्ति में बैठाकर गुरूद्वारा कमेटी के लोगों द्वारा लंगर का प्रसाद दिया गया। इस मौके पर सभा के अध्यक्ष सरदार पपिन्दर सिंह, लाभ सिंह, सेठी, दर्शन सिंह बग्गा, दर्शन सिंह बसंत डीजल, वरिन्दर सिंह, संत सिंह, कुलजीत सिंह, गुरमीत सिंह, सन्नी सिंह, घनश्याम पटेल, राजा, नरिन्दर सिंह रिक्की, जसपाल कौर, हरविन्दर कौर, जगजीत कौर, गुरप्रीत कौर, सिमरन कौर, खुशी, हरजीत कौर सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे। 

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