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शुक्रवार, 8 मार्च 2019

हम तो पढ़े लिखे नही है, लेकिन बच्चो को पढ़ा लिखा कर बड़ा आदमी बनाएंगे - रेखा

वाराणसी, विक्की मध्यानी । आधी आबादी यानी महिलाएं हर क्षेत्र में अपने काबिलियत का लोहा मनवा रही हैं। शायद ही कोई ऐसा फील्ड हो जहां महिलाओं की भागीदारी न हो,चाहे वो कार्य का सर्वोच्च क्षेत्र हो या कार्य का अंतिम पायदान, मने तमाम बंदिशों और परम्परागत सोचों को चुनौती देते हुए आजकी महिलाएं ट्रेन से लेकर ट्राली तक की हैंडल संभाल रही हैं। जब बात परिवार के हैंडल करने की यानी पालन पोषण की आ जाये तो डर भय दिन रात को भूल आजीविका चलाने के लिए मैदान में कूद पड़ती हैं। 

ऐसी ही एक महिला है रेखा सोनकर, जिले के पांचों पंडवा शिवपुर सोनकर बस्ती में रहने वाले महेन्द्र सोनकर से तकरीबन एक दशक पूर्व रेखा का विवाह हुआ था। समय के साथ महेंद्र से रेखा को एक पुत्र सूरज दो पुत्री सन्ध्या प्रियंका हुईं, मंडी से सब्जी खरीद कर ठेले पर बेचने वाले महेंद्र रेखा और महेंद्र के गृहस्थी की गाड़ी रफ्तार पकड़ती उसके पहले ही एक दिन भोर में मंडी जाते समय महेंद्र के ऊपर पेड़ का मोटा डाल टूट कर गिरने से मौके पर ही महेंद्र की मौत हो गयी। अभी ठीक से दुनियादारी को समझ न पायी अनपढ़ रेखा के जीवन में हुए इस वज्रपात ने रेखा को भविष्य अंधकारमय दिखने लगा। पति के असामयिक मौत से टूट चुकी रेखा पर बच्चों के पालन पोषण के साथ ही पढ़ाई लिखाई की पूरी जिम्मेदारी आन पड़ी। तब रेखा ने तय किया की पति वाले कार्य को वो अब खुद करेगी, इसके बाद रेखा रोज भोर में चार बजे घर से बीस किलोमीटर दूर पिंडरा सब्जी मंडी जाती है वहां से सब्जियों को खरीद कर लाती है। फिर बच्चों को बगल के स्कूल में भेजने के बाद दोपहर तीन बजे से लेकर रात दस बजे तक ठेले पर सब्जी बेचती है,इस दौरान स्कूल से वापस आने के बाद बच्चे भी माँ के काम में हाथ बताटे हैं। बकौल रेखा साहेब हम ना पढ़ल लिखल हई मगर बच्चन के पढ़ा लिखा के बड़ आदमी बनावे के सोचले हई।  वहीं रेखा से सब्जी खरीद रहे वाराणसी जिले में पदस्थ एक इंस्पेक्टर हिमेंद्र सिंह ने पूछा कि सरकार द्वारा कोई सुविधा मिली कि नही आपको, तो रेखा का कहना था कि साहेब हम अकेले हई केसे कहब सुबिधा वदे आप लोगन देखा कुछ सरकार से मदद मिल जाय। पति के मौत के बाद  जिम्मेदारीयों का बखूबी निर्वहन कर रही रेखा सोनकर के जज्बे को विश्व महिला दिवस पर हम सलाम करते हैं।

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