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शुक्रवार, 15 मार्च 2019

बदहाल गोशाला मवेशियों के लिये साबित हो रही कब्रगाह

फतेहपुर, शमशाद खान । गोवंशों के नाम पर देशभर में जहाँ सियासत गर्म है वहीं गाय के नाम पर संसद से लेकर सड़क तक हंगामा मच चुका है। प्रदेश में भी गाय के नाम पर कई हत्याये आगजनी व सम्प्रदायिक माहौल बिगड़ चुका है। प्रदेश की योगी सरकार बनने के बाद से जहां अन्ना मवेशियों की समस्याओं से जूझ रहे किसानों एवं शहरी नागरिकों को राहत देने के लिए व गौ संरक्षण के लिये सभी जनपदों में गौशाला का निर्माण शुरू कराया गया है।
इन गौशालाओं में शहरी क्षेत्रों में सड़कों के किनारे घूमने वाले आवारा गोवंश व ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की फसल नष्ट करने वाले अन्ना मवेशियों को रखा जा रहा है। प्रदेश सरकार द्वारा अन्ना मवेशियों के रहने एवं खाने के लिए बजट भी निर्गत किया गया है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि पशुओं के लिए बनाई गई यह गौशालाये मवेशियों के लिए कब्रगाह बनती जा रही है। जिले की सबसे बड़ी गौशालाओं में से एक देवलान गौशाला एवं भिटौरा विकास खण्ड के ग्राम सलेमाबाद स्थित गौशाला की स्थिति बेहद खराब है। जहाँ भूख के अभाव नन्दी व गायों की निरन्तर काल के गाल में समाते जा रहे है। यूं तो जिले में 19 गोशाला प्रस्तावित है लेकिन वर्तमान में गोशालाओं को शुरू किया जा चुका है। ग्राम समाज की जमीनों में संचालित की जा रही यह गोशालाएं प्रदेश के सीएम के ड्रीम प्रोजेक्टों में शामिल है लेकिन गौशालाओं की दुर्दशा ऐसी है कि यह बेजुबान जानवरो के लिए प्रताड़ना गृह में बदल चुकी है। प्रदेश सरकार के गोवंश संरक्षण के निर्देश पर तत्कालीन जिलाधिकारी आंजनेय कुमार सिंह द्वारा जनपद के 13 विकास खण्डों में 19 गौशाला का निर्माण शुरू कराया गया था। कई गौशालाओं को शुरू भी करके बड़ी संख्या में अन्ना मवेशियों को भेजकर शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों को राहत दिलाने की बात कही गई थी लेकिन देवलान व सलेमाबाद की गौशाला में जानवरों के लिए नाम मात्र की सुविधाएं होने से गौशाला की सुविधा चरमरा सी गई। जहां गौशाला निर्माण में बाउंड्रीवॉल के नाम पर मिट्टी की दीवार और गेट बनाया गया है तो वही ग्राम समाज की भूमि के गड्ढे में पानी भर कर तालाब की शक्ल दे दी गई है। अव्यवस्था की हालत ऐसी की देवलान स्थित गोशाला करीब दो सौ दस बीघे के क्षेत्रफल में बनी है। पानी के तालाब नुमा गढ्ढे है लेकिन लेकिन भूसे के लिए बना गोदाम खाली पड़ा है। गोशाला में मवेशियों के मल को साफ करने के लिए आठ सफाई कर्मचारी नियुक्त है लेकिन सफाई कितनी होती है इसका अंदाजा देख कर लगाया जा सकता है। इतने बड़े क्षेत्रफल में बनी गोशाला के पूरे मैदान में इतने पेड़ पौधे नही हैं यह मवेशी अपना चन्द समय गुजार सके या इन पेड़ों की पत्तियों से अपना पेट भर सके भूखे पेट घुमाना ही इन नंदियो और गोवंशों की तकदीर बन चुकी है। ऐसे में भुखमरी की कगार पर पहुंचे इन मवेशियों आसपास के खेतों को चरने पर मजबूर हैं परन्तु पहले से ही दुर्दशा के शिकार किसानों द्वारा खेतों से भगाकर उन्हें वापस गौशाला में बंद कर दिया जाता है चारा न मिलने से भूख के कारण गौशाला में बंद इन गोवंशों की तड़प तड़प के मौत हो रही है। यदि इन गौवंशो की स्थिति पर नजर डालें तो आपको गौशालाओं के भीतर तिल तिल कर भूख से मरते हुए बेजुबान दिखाई देंगे। वहीं अधिक संख्या में खुरपका मुंहपका रोग से ग्रस्त बीमार गौवंशो को देखा जा सकता है। नाम न छापने की शर्त पर एक किसान ने बताया कि प्रतिदिन इन गौशाला में दो से तीन मवेशियों की मौत हो जाती है। वही गौ शालाओं में काम करने वाले कर्मचारी भी चारे की कमी के कारण दबी जुबान इस तथ्य को स्वीकार करते है। गोवंश संरक्षण के नाम पर बड़ी बड़ी राजनीति करने वाले राजनेताओं और जनपद में अपनी राजनीति चमकाने वाले गैर सरकारी व हिन्दू संगठनों द्वारा इन गौशालाओ की सुधि न लिया जाना बेहद चिंतनीय है। वही शासन के निर्देश पर प्रशासन द्वारा निर्मित कराई गई गौशालाओं की अव्यवस्था जनपद के प्रशासनिक अफसरों पर सवालिया निशान लगाती है। मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट होने के बाद भी गोवंश संरक्षण के लिए अलग से बनाये गए गोसेवा आयोग के गठन होने के बाद भी अन्ना पशुओं को रखने लिए बनाई गयी गौशालाओ की इस स्थिति के लिए कोई जवाबदेही न होना अपने आपमें एक सवाल है।

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