AMJA BHARAT एक वेब न्‍यूज चैनल है जिसे कम्‍प्‍यूटर, लैपटाप, इन्‍टरनेट टीवी, मोबाइल फोन, टैबलेट इत्‍यादी पर देखा जा सकता है। पर्यावरण सुरक्षा के लिये कागज़ बचायें, समाचार वेब मीडिया पर पढें

शुक्रवार, 8 मार्च 2019

महिला दिवस: आज भी दो जून की रोटी के लिये महिलाएं कर रही संघर्ष

फतेहपुर, शमशाद खान । अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस ''इंटरनेशनल वोमेंस डे'' को अंतरराष्ट्रीय क्रियाशील महिला दिवस या महिलाओं के अधिकारो का दिवस भी कहा जाता है। जो समाज में महिलाओं के योगदान और उपलब्धियों पर ध्यान आकर्षित कराने के लिये दुनिया भर के सभी देशों में हर वर्ष 8 मार्च की आयोजित किया जाता है। आधी आबादी द्वारा महिला बिरादरी के लिये कार्यों की सराहना करके और उनके लिये प्यार व सम्मान जताने के लिये मनाया जाता है।
महिलाएँ समाज व परिवार का मुख्य हिस्सा होती हैं जो हर क्षेत्र में आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक क्रियाओं में एक बड़ी भूमिका निभाती हैं, महिलाओं की सभी उपलब्धियों की सराहना करने और याद करने के लिये दुनिया अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को एक उत्सव की तरह मनाती है। परन्तु दुनिया के अनेक देशों समेत भारत में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मात्र एक तारीख बनकर रह गया है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर जहां बड़ी-बड़ी हाई सोसायटी एवं पेज 3 स्तर की महिलाओं द्वारा बड़े बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं जिसमें अंतर्राष्ट्रीय या राष्ट्रीय स्तर की ख्याति प्राप्त बड़े बड़े घरानों की महिलाओं को सम्मानित किया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का यह एक बड़ा दिखावा मात्र है। जब की तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि आज भी देश भर की महिलाओं को उनके अधिकार एवं मूलभूत सुविधाएं मयस्सर नहीं है। अपने परिवार को पालने के लिए महिलाएं पीठ पर बच्चे को बांधकर मजदूरी, ईट-गारा, फुटपाथ पर खोमचे, फैक्ट्रियों से लेकर बारात में रोड लाइट लिए हुए अक्सर काम करते हुए देखी जा सकती हैं। शायद इन महिलाओं को महिला अधिकार या अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की न तो कोई जानकारी है और न ही कोई सरोकार। केंद्र एवं प्रदेश सरकार द्वारा बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान एवं महिलाओं के उत्थान के लिए अलग-अलग तरह की योजनाओं का संचालन किया जाता है। महिला अधिकारों की बातें बड़े-बड़े मंचों से की जाती है महिलाओं को रोजगार देने के लिए समूह आधारित अनेक कार्य योजनाएं, उद्योगों को ऋण उपलब्ध कराने की बात कही जाती है लेकिन आज भी देश की आधी आबादी होने का गौरव हासिल करने वाली महिलाओं को उनकी अधिकार नहीं दिए जा सके हैं। महिला अधिकारों को लेकर बड़ी-बड़ी मीटिंग की जाती है। अनेक मंचों से उनके अधिकारों की लड़ाई करने वाले घोषणा करते हुए दिखाई दे जाते हैं। लेकिन जमीन पर इन की हकीकत आज भी ढाक के तीन पात जैसी है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर देश में अग्रणी भूमिका निभाने वाली कारपोरेट जगत, सरकारी व गैर सरकारी क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को सम्मानित कर महिला अधिकारों एवं अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का बखान तो किया जाता है। वही आज भी मलिन बस्तियों आदिवासियों महिलाओं एवं बच्चियों की आज भी हालत जस की तस है। शिक्षा रोजगार और भरपेट भोजन जैसी मूलभूत सुविधाएं भी उनके पास मौजूद नहीं है। महिला अधिकारों को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की जाती है लेकिन सरकारी व गैर सरकारी क्षेत्रों समेत देश की विधानसभा एवं लोकसभा तक में महिलाओं की संख्या आज भी अनुमात के हिसाब से नही है। देशभर के सभी राजनीतिक दल महिला अधिकारों की बात तो करते हैं लेकिन अपने चुनावी एजेंडे में इन मुद्दों को न तो शामिल करते हैं और न ही टिकट बंटवारे में इस बात का ध्यान रखा जाता है। ऐसे में राजनीतिक दल महिलाओं के प्रति कितने गंभीर हैं इसको अच्छे से समझा जा सकता है। देश की आधी आबादी यानी कि महिलाएं आज भी बड़ी संख्या में घरों को चलाने में मुख्य भूमिका में जिन्हें अपने परिवार को पालने के लिए न केवल घरों से निकलना पड़ता है बल्कि मजदूरी करके परिवार को पढ़ना पढ़ना यह महिलाएं खेतों, फैक्ट्रियों, निर्माण कार्यों में कार्य करने बोझ उठाने जैसे कठिन कार्य को करती हुई आसानी से देखी जा सकती हैं। महिला अधिकारों के अलंमबरदारों द्वारा महिला सशक्तिकरण एवं महिलाओं द्वारा किए जा रहे सराहनीय कार्यों के लिए मात्र कुछ एक महिला चेहरों को ही प्रदर्शित किया जाता है जबकि बड़ी संख्या में और उपेक्षित महिलाओं की कोई सुधि तक नहीं लेता है। आदिवासी बहुल्य क्षेत्रों में महिलाएं न केवल पीने के पानी के लिए कई-कई किलोमीटर तक की दूरियां तय करती है बल्कि गरीबी के अभाव में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं से भी वंचित रहती हैं। इन महिलाओं द्वारा मासिक धर्म के दौरान सिनेटरी पैड्स की जगह पुराने कपड़ों, लकड़ियों, कोयलों एवं बालू को कपड़ों में भरकर प्रयोग में लाया जाता है जो कि उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है। साफ सफाई न होने के कारण यह महिलाएं अक्सर संक्रमण का शिकार हो जाती हैं और चिकित्सकीय सुविधाएं न मिलने के कारण यह समस्याएं इन की मौत का कारण तक बन जाती हैं। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर कारपोरेट जगत की एवं समाज में उच्च पहुंच वाली महिलाओं का गुणगान करके अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस तो मना लिया जाता है लेकिन समाज के उपेक्षित इन महिलाओं के दर्द को नजर अंदाज करके आखिर अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को महिलाओं के अधिकार या महिलाओं का विशेष दिन कैसे कहा जा सकता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Advertisement

Advertisement

लोकप्रिय पोस्ट