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मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

हुनर से रंग भरने वालों का जीवन बदरंग

कानपुर नगर, हरिओम गुप्ता - धीरे-धीरे हाथों के कारीगरों की जरूरत समाप्त होती जा रही है। इस देश में अधिकांश काम अभी तक मानवीय हाथों के द्वारा किये जाते रहे है चाहे वह लकडी का हो, कढाई का हो, पेंटिग का हो या कोई अन्य। आधुनिकता बढने के साथ साथ नई नई मशीनो के आ जाने के कारण हाथ के हुनरमंदो का काम समाप्त होता जा रहा है और उनके सामने अपने परिवार के भरण पोषण की समस्या खडी हो चुकी है। शहर में सैकडों ऐसे लोग थे जो किसी समय मंे अपनी कला से फिल्मों के बडे-बडे पोस्टर बनाते थे, दीवारों पर जगह-जगह उनके हाथों की कारीगिरी लिखावट के रूप में दिखायी देती थी लेकिन इस आधुनिक मशीनी युग में कइ्र हाथ के कारीगर अपन वजूद खोते जा रहे है और इनके सामने रोजी-रोटी एक चुनौती बन गयी है।
           शहर में ही कई रंगशालायें खत्म हो चुकी है। एक साफ पटल पर अपने रंगों से दुनिया सजाने वालो की दुनिया रंगहीन हो चुकी है। समय के बदलाव के साथ कम्प्यूअर द्वारा होने वाले कामो से इनका रेाजगार समाप्त हो चुका है। जहां कुछ ने हथियार डाल दिये है तो वही कुछ अभी भी लडखडाते हुए अपनी राह में चल रहे है। खलासी लाइन निवासी दुर्गा आर्ट के नाम से मशहूर कलाकार दुर्गा ने बताया कि बडे लोग कहते थे कि हाथों में हुनर है तो कहीं भी खाया कमाया जा सकता है और यह सही भी था, लेकिन अब यह सही नही है। बचपन में चित्रकारी का जुनून इस कदर हावी हुआ कि रंगों की दुनिया में ही अपने भविष्य के रंगीन सपने नजर आने लगे और उन्होने हाथों में किसी सिपाही की तरह ब्रश थाम लिया। किसी समय अपने हाथ के हुनर पर नाज करने वाले दुर्गा पेंटर बताते है कि सडक के किनारे अपने हाथेां के सहारे जो भी कुछ थोडा काम मिल जाता है उसे क रवह अपने परिवार को चला रहे है। पहले काम से फुर्रसत नही मिलती थी तथा अन्य कलाकारो को भी साथ रखना पडता था, लेकिन अब काम ही नही है। आज पोस्टर, होर्डिंग, बैनर सभी चीजें मशीनों से छप रही है, जिससे उनके जैसे सैकडो लोगो का काम बंद हो चुका है। बताया पहले कानपुर के बाहर से भी काम आता था अ बवह पूरी तरह बंद है। मशीनों पर होने वाले कार्यो के ऐजेण्ट कानपुर के बाहर जाकर आर्डर लेने लगे है। कहा कुछ विषेष अवसरों जैसे त्योहारो या किसी आयोजन के समय भले ही थोडा काम मिल जाये वर्ना महीनो कोई काम नही आता है। यह किसी एक की व्यथा नही है। विभिन्न क्षेत्रों में हाथों के हुनर से खाने कमाने वालों का आज यही हश्र है। कुछ तो अपने कामों को बंद कर चुके है और कुछ अीभी भी लकीर पीट रहे है। ऐसे लोगों को कोई सुनिश्चिित भविष्य नही है। चाहे पेंटर हो, कागज व मिटटी के खिलौने बनाने वाले, पतंग बनाने वाले, लकडी के खिलौने बनाने वाले या कोई अन्य हाथ के हुनरमंद आज इनकी कारीगरी का कोई मोल नही रह गया है।

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