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सिक्ख समुदाय ने मनाया खालसा पंथ की स्थापना का 320 वां पर्व

फतेहपुर, शमशाद खान । शहर के रेल बाजार स्थित गुरूद्वारे में श्री गुरू सिंह सभा के तत्वाधान में सिक्ख समुदाय के लोगों द्वारा खालसा पंथ की स्थापना का 320 वां पर्व धूमधाम से मनाया गया। स्थापना के मौके पर बड़ी संख्या में सभी धर्मों के लोगों ने शिरकत की। गुरूद्वारे में प्रातः सबद, कीर्तन हुआ। तत्पश्चात विशाल लंगर का आयोजन किया गया। जिसमें सभी लोगों ने पंक्ति में बैठकर लंगर का प्रसाद छका। गुरूद्वारे में ज्ञानी ने खालसा पंथ की स्थापना के बाबत विस्तार से प्रकाश डाला। 
गुरूद्वारे के ग्रंथी गुरूवचन सिंह ने बताया कि बैसाखी नाम बैसाख से बना है। पंजाब और हरियाणा के किसान सर्दियों की फसल काट लेने के बाद नये साल की खुशियां मनाते हैं। इसी दिन अप्रैल 1699 को दसवें गुरू श्री गुरू गोविन्द सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। उन्होने बताया कि प्रकृति का नियम है कि जब भी किसी जुल्म, अन्याय या अत्याचार की अधिकता होती है तो उसके उपाय के लिए कोई कारण भी बन जाता है। इसी नियमाधीन जब मुगल शासक औरंगजेब द्वारा जुल्म व अत्याचार की हर सीमा लांघ गुरू तेग बहादुर को दिल्ली के चांदनी चैक पर शहीद किया गया तब श्री गुरू गोविन्द सिंह ने अपने अनुयायियों को इकट्ठा करके खालसा पंथ की स्थापना की। जिसका लक्ष्य था धर्म व नेकी के आदर्श के लिए हमेशा तैयार रहना। निम्न जाति के समझे जाने वाले लोगों को जिन्हें तुच्छ समझा जाता था दशमेश पिता ने उन्हें अमृत छका कर सिंह बना दिया। इस तरह 13 अप्रैल सन 1699 को श्री केशगढ़ साहिब, आनन्दपुर में दसवें गुरू श्री गुरू गोविन्द सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना कर अत्याचार को समाप्त किया। उन्होने सभी जातियों के लोगों को एक ही अमृत पात्र से अमृत छका कर पांच प्यारे सजाये। इन्हीं की कृपा के सजे हम हैं, नहीं मोसे गरीब करोर परे। श्री गुरू गोविन्द सिंह ने इस मौके पर पांच शीशों की मांग की। जिसे भाई दया सिंह, भाई धर्म सिंह, भाई मोल्कम सिंह, भाई साहिब सिंह व भाई हिम्मत सिंह ने पूरा किया। इन पांचों को गुरू के पंज प्यारे कहा जाता है। ये पांच प्यारे किसी एक जाति या स्थान के नहीं थे बल्कि अलग-अलग जाति, कुल व स्थानों के थे। जिन्हें गुरू जी ने अमृत छका कर इनके नाम के साथ सिंह शब्द लगा दिया। ना कउ बैरी न बेगाना, सगल संग हम कउ बन आयी। इस मौके पर गुरूद्वारे में सुबह से ही बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। गुरूद्वारा परिसर में ही विशाल लंगर का आयोजन किया गया। जिसमें महिलाओं, पुरूषों व बच्चों ने पंक्ति में बैठकर लंगर का प्रसाद छका। लंगर देर शाम तक चलता रहा। इस मौके पर पपिन्दर सिंह, लाभ सिंह, दर्शन सिंह बग्गा, संतोष सिंह बग्गा, दर्शन सिंह बसंत डीजल, वरिन्दर सिंह, जितेन्द्र पाल सिंह, चानण सिंह, गुरूचरन कौर, मंजीत कौर, हरविन्दर कौर, ईसर कौर, जसपाल कौर आदि मौजूद रहे। 

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