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लौटी कैलाश मंदिर प्रांगण की रौनक

कानपुर नगर, हरिओम गुप्ता - शिवाला स्थित कैलाश मंदिर का विशाल प्रांगण विभिन्न प्रकार के फूलो से सजा रहता था, क्यों कि यहां फूलों की मण्डी लगा करती थी। फूलों की महक से बरबस ही मन इस फूलबाजार की ओर आकर्षित हो उठता था, लेकिन कुछ समय पहले कुछ लोगो ने किसानो को बरगलाना, उन्हे परेशान करना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे बाहर से आने वाला वह किसान जो दूर-दराज इलाके से 5-10 किलो फूल लेकर आता था उसे परेशानी होने लगी और मण्डी यहां से चली गयी। पहले फूलबाग किला रोड पर कुछ दिन मण्डी लगी फिर उसके बाद कैंट जयपुरिया रोड पर मण्डी लगने लगी उसके बाद कैंट के ही मैस्कर घाट मार्ग पर मण्डी लगने लगी। मैस्करघाट में जहां किसानो को साधन की परेशानी होती थी तो वहीं फुटकल मालियों को भी कैंट एरिया होने के कारण परेशानी उठानी पडती थी, वहीं बाहरी लोगों के आवागमन के कारण कैंट एरिया की सुरक्षा भी प्रभावित हो रही थी। अतं में मण्डी को पुनः शिवाला कैलाश मंदिर में लाया गया।
              शिवाला कैलाश मंदिर में लगने वाली फूलमण्डी वर्षो पुरानी है और यहां कानपुर तथा आस-पास से किसान अपने फूल लेकर आते है। वैसे तो नौबस्ता रोड पर थोक मण्डी लगती है लेकिन छोटे किसानो का कहना है कि बडा चैराहा तक आना उनके लिए आसान और कम खर्च का है वहीं 25-30 किमी0 से आने वाले किसान साइकिल से ही आ जाते है। किसानो ने कहा कि वर्ष भर से ज्यादा समय से वह भटक रहे है लेकिन वापस कैलाश मंदिर में आने से वह खुश है। किसानो ने बताया कि वह आस-पास से ही आते है और प्रतिदिन जितने फूल होते है वह बेंचने आते है किसी के पास 10 तो किसी के पास 20 किलो फूल होते है। किसानो ने बताया कि कैलाश मंदिर मण्डी उनके लिए सरल है क्यों कि यदि नौबस्ता जाये तो पैसा भी अधिक लगेगा और मेहनत भी निकलेगी। वहीं स्थानीय दुकानदारो ने बताया कि मण्डी जाने के बाद वह लोग बेकार हो गये थे। दुकानदारी लगभग समाप्त हो गयी थी लेकिन अब मण्डी आने के बाद फिर फुटकर माली व ग्रहक आने लगे है जिससे उनकी भी दुकानदारी बढी है वहीं खाने-पीने की दुकाने भी चलने लगी है। कुछ लोगों ने बताया कि ऐसे भी लोग है जो नही चाहते कि मण्डी यहां लगे और वह हमेशा इसी प्रयास में लगे रहते है, जबकि कैलाश मंदिर प्रबंधक स्वयं किसानो के हित के लिए काम करते है और अपनी जगह पर किसानो को फूल बेचने के लिए मण्डी लगाने का स्थान देते है। अब मण्डी वापस आने से पूरे कैलाश मंदिर प्रांगण की रौनक वापस आ गयी है। यहां के मंदिरो में प्रतिदिन समाजवट भी होती है और श्रृंगार भी।

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