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अयोध्या शोध संस्थान के तत्वाधान में विमल उच्चतर

माध्यमिक विद्यालय के बच्चों को दिखायी गई रामलीला

कानपुर, संवाददाता| संस्कृति मन्त्रालय, भारत सरकार के सहयोग तथा अयोध्या शोध संस्थान के तत्वाधान में  दीपांजलि समाजोत्थान समिति द्वारा विमल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, हनुमन्त विहार, नौबस्ता के बच्चों को एक घण्टे की रामलीला दिखाकर उन्हें भारतीय संस्कृति से जोड़ने का प्रयास किया गया| संस्कृति मन्त्रालय तथा अयोध्या शोध संस्थान की इस अनूठी पहल की जहां सभी ने सराहना की वहीं विद्यालय के बच्चे बेहद उत्साहित दिखे| नयी पीढ़ी को प्राचीन संस्कारों से इस प्रकार जोड़ने वाला कानपुर शहर में संभवता यह पहला प्रयोग था| इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए 19 और 20 जुलाई को दीपांजलि समाजोत्थान समिति के कलाकार शहर के अन्य दो विद्यालयों में भी इसी तरह से रामलीला का मंचन करेंगे|

दक्षिण कानपुर के नौबस्ता क्षेत्र में स्थित विमल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के अध्यापकों ने जैसे ही बच्चों को यह बताया कि आज इंटरवल के बाद विद्यालय में रामलीला दिखायी जाएगी| वैसे ही सभी बच्चे अति उत्साहित हो गए| क्योंकि दशहरा आदि के समय बच्चों को रामलीला ढेखने की इजाजत प्रायः बहुत कम ही मिलती है| इंटरवल समाप्त होते-होते सभी बच्चे विद्यालय के हॉल में एकत्रित हो गये| बच्चों के साथ-साथ उनके शिक्षकों का भी इस तरह का पहला अनुभव था| रामलीला के कलाकारों के लिए भी संभवता यह प्रथम अवसर रहा होगा जब उनके सामने दर्शकों के रूप में सिर्फ विद्यार्थी और उनके शिक्षकगण थे|

दीपांजलि समाजोत्थान समिति के महासचिव डॉ॰दीपकुमार शुक्ल ने बताया कि अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक डॉ॰योगेन्द्र प्रताप सिंह तथा कोषाध्यक्ष राजकपूर जी द्वारा जब विद्यालयों में रामलीला के मंचन का दायित्व हमारी संस्था को सौंपा गया, तब यह निर्णय लेने में काफी विचार करना पड़ा कि एक घण्टे की अवधि में रामलीला का कौन सा प्रसंग दिखाया जाये जिससे बच्चों को जहां कुछ शिक्षा प्राप्त हो वहीं उनकी रुचि भी बनी रहे| काफी विचार करने के बाद यह तय हुआ कि बच्चों को राम-वनवास का प्रसंग दिखाया जाये| क्योंकि रामलीला का यह प्रसंग पारिवारिक एवं सामाजिक अनुशासन के साथ-साथ सदाचरण तथा आदर्शवादी जीवन परम्परा का भी पूर्ण प्रतिनिधित्व करता है|

रामलीला कार्यक्रम की शुरुआत परम्परागत तरीके से विद्यालय की प्रबन्धक श्रीमती गीता शुक्ला तथा प्रधानाचार्य विमल कुमार शुक्ल द्वारा श्रीराम-लक्ष्मण की आरती करके की गई| उसके बाद निर्देशक डॉ॰दीपकुमार शुक्ल ने बच्चों को रामलीला का महत्व बताते हुए रामलीला का मंचन शुरू कराया| जिसमें दिखाया गया कि राजा दशरथ द्वारा राम को युवराज बनाने की बात जैसे ही दासी मंथरा को पता चली वैसे ही उसने महारानी केकई को भड़काकर राजा दशरथ से भरत के लिए राजगद्दी तथा राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास वरदान में मँगवा लिया| अपने बचन की रक्षा के कारण राजा दशरथ केकई का खुलकर प्रतिकार भी न कर सके| राम को जब यह बात पता चली तो वह प्रसन्न मन से वन को चले दिये| उनके साथ सीता और लक्ष्मण भी चल पड़े| राम के वियोग में राजा दशरथ ने प्राण त्याग दिये| यह बात जब भरत को ज्ञात हुई तो उन्होने अपनी माँ केकई को बहुत भला बुरा कहा और राम को वापस लाने उनके पास चित्रकूट पहुँच गये| काफी अनुनय विनय के बाद जब राम वापस नहीं लौटे तो भरत उनकी खड़ाऊँ लेकर अयोध्या लौट आये और उन खड़ाऊँवों को सिंहासन पर रखकर राज-काज चलाने लगे| रामलीला मंचित करने वाले कलाकारों में आशीष कुमार पाण्डेय, आदर्श कुमार पाण्डेय, गोपाल अवस्थी तथा गोलू द्विवेदी क्रमशः राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के रूप में रहे| जबकि लाल जी दीक्षित दशरथ तथा करिश्मा केकई के रूप में| टिंकू कानपुरी मंथरा बने तो विजयकान्त त्रिपाठी वशिष्ठ| प्रमोद कुमार द्विवेदी ने सुमन्त की भूमिका निभाई| रत्नेश त्रिपाठी ने व्यास तथा सुशील द्विवेदी ने तबलवादक का दायित्व सँभाला| इस अवसर पर विद्यालय के संरक्षक कृष्ण गोपाल शुक्ल, श्रीमती रामप्यारी शुक्ला, से॰नि॰ प्रधानाध्यापक रामगोपाल शुक्ल, भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य श्याम सिंह पँवार, विद्यालय के शिक्षक चन्द्रप्रकाश शुक्ल, दुर्गाप्रसाद शुक्ल, सुशील कुमार, मंजू त्रिवेदी, सुनीता शुक्ला, राहुल त्रिपाठी, जी॰एन॰के॰ तिवारी, सृष्टि, प्रज्ञा और खुशबू यादव सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे| प्रस्तुति सहायक के रूप में दीपांजलि शुक्ला तथा युवराज ने दायित्व सँभाला|

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